कोहिमा: प्रभावशाली नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइज़ेशन (एनईएसओ) ने सोमवार को कहा कि संगठन ओटिंग नरसंहार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फ़ैसले से बहुत परेशान है।
सात पूर्वोत्तर राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले आठ छात्र संगठनों के एक शीर्ष निकाय एनईएसओ ने कहा कि विशेष जाँच दल (एसआईटी) द्वारा उजागर किए गए भारी सबूतों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर को कथित तौर पर “आरोपी सैन्य कर्मियों” के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बंद कर दी।
एनईएसओ के अध्यक्ष सैमुअल जिरवा और महासचिव मुत्सिखोयो योबू ने एक संयुक्त बयान में कहा कि 4 दिसंबर, 2021 को नागालैंड के मोन जिले में हुई दुखद घटना में भारतीय सेना की एक इकाई 21 पैरा (एसएफ) के कर्मियों द्वारा 14 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या की गई।
एनईएसओ नेताओं ने कहा, “यह निर्णय पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए न्याय का सीधा खंडन है, जो जवाबदेही का इंतजार कर रहे हैं। नागालैंड सरकार द्वारा गठित एसआईटी ने गहन जाँच की, जिसमें भारी सबूत मिले कि ओटिंग हत्याकांड में वरिष्ठ अधिकारियों सहित 21 पैरा (एसएफ) के 30 कर्मियों को फँसाया गया था। आरोप पत्र मोन के जिला एवं सत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था, फिर भी केंद्र सरकार ने उनके अभियोजन को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है।"
उन्होंने कहा कि जवाबदेही की यह कमी कानूनी प्रक्रिया को कमजोर करती है और कानून के शासन का मजाक उड़ाती है, खासकर पूर्वोत्तर के संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ ऐतिहासिक अन्याय ने गहरे जख्म छोड़े हैं।
एनईएसओ के बयान में कहा गया है, "सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों द्वारा महसूस किए जा रहे अलगाव की भावना को और बढ़ाता है, खासकर तब जब कोर्ट ने खुद स्वीकार किया कि अगर केंद्र सरकार अभियोजन की मंजूरी देती है तो मामला आगे बढ़ सकता है।"
इसमें कहा गया है कि यह नौकरशाही गतिरोध एक खतरनाक संकेत देता है - कि नागरिकों, खासकर हाशिए पर पड़े और अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले पूर्वोत्तर के लोगों का जीवन सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) के कठोर आवरण के तहत बेकार है।
एएफएसपीए को निरस्त करने की माँग करते हुए, एनईएसओ ने कहा कि यह कानून पूर्वोत्तर में हिंसा, दंड से मुक्ति और घोर मानवाधिकार उल्लंघन को जारी रखता है।
शीर्ष छात्र संगठन ने कहा, "ओटिंग नरसंहार इस बात की एक और दुखद याद दिलाता है कि कैसे एएफएसपीए ऐसे जघन्य कृत्यों को बिना किसी जवाबदेही के होने देता है।" उन्होंने माँग की कि केंद्र सरकार ओटिंग नरसंहार में शामिल 21 पैरा (एसएफ) कर्मियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की तुरंत मंजूरी दे और पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय दिलाए।
एनईएसओ ने कहा, "अगर पूर्वोत्तर में एएफएसपीए को पूरी तरह से निरस्त नहीं किया जाता है, तो यह क्षेत्र में अविश्वास और हिंसा के चक्र को और गहरा करेगा।" उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में ऐसे कानून का कोई स्थान नहीं है।
17 सितंबर को, जस्टिस विक्रम नाथ और पी.बी. वराले की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दिसंबर 2021 में राज्य के मोन जिले में 14 नागरिकों की हत्या के संबंध में भारतीय सेना की ऑपरेशनल टीम के सदस्यों के खिलाफ नागालैंड सरकार द्वारा शुरू की गई एफआईआर और उसके बाद की आपराधिक कार्यवाही को बंद करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने 21 पैरा (विशेष बल) के कर्मियों के खिलाफ दर्ज स्वत: संज्ञान एफआईआर को रद्द करने के लिए अधिकारियों की पत्नियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं को अनुमति दी।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, 1958 की धारा 6 के तहत मंजूरी को पिछले साल फरवरी में सक्षम प्राधिकारी द्वारा खारिज कर दिया गया था। धारा 6 में प्रावधान है कि केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना एएफएसपीए के तहत किए गए किसी भी कार्य के संबंध में किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई अभियोजन, मुकदमा या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती है।
ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन, ऑल नगा स्टूडेंट्स एसोसिएशन और यूनाइटेड नगा काउंसिल सहित लगभग सभी नगा संगठनों ने हत्याओं के खिलाफ कई आंदोलन किए और 21 पैरा (विशेष बल) कर्मियों के लिए सजा की माँग की।
यह भी पढ़ें: अरुणाचल: राज्यपाल ने क्रा दादी से टीबी रोगियों को नि-क्षय मित्र के रूप में गोद लिया
यह भी देखें: