जलविद्युत परियोजना में विसंगतियां: जांच सीबीआई को सौंपी गई
स्टाफ रिपोर्टर
गुवाहाटी: राज्य कैबिनेट ने बुधवार को कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान जलविद्युत परियोजना के नाम पर हुई गड़बड़ियों की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया|
2009 में, तत्कालीन राज्य सरकार ने बोर डिकराय में 5 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना स्थापित करने का निर्णय लिया और इसका काम मेसर्स मेकॉन पावर को सौंपा। हालाँकि, परियोजना पर काम 2015 में रोक दिया गया था। काम रुका हुआ था क्योंकि सरकार ने वन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी प्राप्त किए बिना परियोजना पर काम शुरू कर दिया था। काम रुकने के बाद कंपनी ने उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसके बाद मुआवजे के रूप में 100 करोड़ रुपये की राशि देने का आदेश दिया गया। सरकार की ओर से मुआवजा राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका है|
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे को लेकर कहा कि एचसी के आदेश के अनुसार मुआवजे के भुगतान के लिए जो भी जिम्मेदार है, उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। “वन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी प्राप्त किए बिना कार्य आदेश कैसे जारी किया गया? बिना सुधारात्मक कदम उठाए प्रोजेक्ट पर काम क्यों रोका गया? निर्णय के परिणामस्वरूप, सरकार को 100 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ा, और लगभग 34 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना बाकी है। हमें पता लगाना चाहिए कि कौन जिम्मेदार था और हम इसके लिए मामले की जांच सीबीआई को सौंपना चाहते हैं। केवल एक राजनीतिक नेता, पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, और वह अब नहीं रहे। हमें परियोजना में शामिल अधिकारियों से सच्चाई का पता लगाना होगा, ”उन्होंने कहा।
कैबिनेट ने पीपीपी मोड में राज्य के 22 जिलों में 22 आईसीयू स्थापित करने का भी निर्णय लिया है। सरकार प्रत्येक आईसीयू पर 23 करोड़ रुपये खर्च करेगी| ऐसे आईसीयू में भर्ती मरीजों को सरकारी अस्पतालों द्वारा ली जाने वाली दर का भुगतान करना होगा, और बिल की शेष राशि सरकार द्वारा वहन की जाएगी।
सरकार और टाटा ट्रस्ट के बीच 17 कैंसर देखभाल केंद्र स्थापित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। कुछ केंद्र पहले से ही चालू हैं, और शेष केंद्रों पर काम चल रहा है। प्रोजेक्ट की लागत में सरकार का हिस्सा 2803 करोड़ रुपये और टाटा ट्रस्ट का हिस्सा 1100 करोड़ रुपये था| बुधवार को कैबिनेट ने टाटा ट्रस्ट के साथ समझौते को अगले 5 साल के लिए रिन्यू कर दिया, क्योंकि पहले हुए समझौते की अवधि लगभग खत्म हो चुकी थी|
कैबिनेट ने यह भी निर्णय लिया कि एपीएससी द्वारा आयोजित राजपत्रित अधिकारियों सहित पदों के लिए आवेदन करने वाले एससी और एसटी उम्मीदवारों को परीक्षा शुल्क का भुगतान नहीं करना होगा।
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