स्टाफ रिपोर्टर
गुवाहाटी: गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने आज राज्य के गृह एवं राजनीतिक विभाग के प्रधान सचिव और असम के पुलिस महानिदेशक को समय पर हलफनामा दाखिल न करने के कारण व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश जारी किया। हालाँकि, अगर अगली सुनवाई की तारीख से एक दिन पहले हलफनामा दाखिल किया जाता है तो अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति मालाश्री नंदी की खंडपीठ ने अवैध कोयला खनन से संबंधित कई जनहित याचिकाओं के साथ एक जनहित याचिका (सं. पीआईएल/29/2020) पर जारी किया। अन्य बातों के अलावा, जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे टिकोक ओपन कास्ट प्रोजेक्ट के लिए सालेकी पीआरएफ (प्रस्तावित आरक्षित वन) में 98.59 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के प्रस्ताव पर हमला करने और कोल इंडिया लिमिटेड को दी गई मंजूरी को रद्द करने से संबंधित हैं। उठाए गए अन्य मुद्दों में देहिंग पटकाई हाथी वन रिजर्व और उक्त अभयारण्य के आसपास के गलियारे और अन्य पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों को पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र घोषित करना और डिब्रूगढ़ और डिगबोई वन प्रभाग के तहत जयपुर वन रिजर्व, तिरप पीआरएफ, दलाई पीआरएफ और माकुमपानी पीआरएफ को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करना और वन विभाग और कोल इंडिया लिमिटेड के दोषी अधिकारियों पर आपराधिक और दीवानी दायित्व तय करने के लिए सीबीआई या सीवीसी द्वारा उच्च स्तरीय जाँच की मांग करना शामिल है।
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि 27 अप्रैल, 2023 को राज्य के गृह एवं राजनीतिक विभाग के प्रधान सचिव और असम के पुलिस महानिदेशक की ओर से पेश हुए वकीलों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया गया था। इसके बाद 29 अक्टूबर, 2024 और 20 नवंबर, 2024 को मामले की सुनवाई सूचीबद्ध होने के बावजूद, उक्त अधिकारियों द्वारा हलफनामा दाखिल नहीं किया गया है।
न्यायालय ने इस न्यायालय द्वारा पारित 30 मार्च, 2023 के आदेश पर भी ध्यान दिया, जिसके तहत कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा अवैध कोयला खनन कार्यों को न्यायालय के संज्ञान में लाया गया था, और डीएसजीआई (भारत के उप सॉलिसिटर जनरल) द्वारा दिए गए बयानों को भी दर्ज किया गया था कि कोल इंडिया लिमिटेड ने आरक्षित वन क्षेत्र में अपनी खनन गतिविधियों को रोक दिया था, और खनन गतिविधियाँ अब कुछ अन्य संस्थाओं द्वारा की जा रही हैं।
बयान पर गौर करते हुए न्यायालय ने कहा कि निस्संदेह यह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का दायित्व है कि वह राज्य सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करे कि असम राज्य में अवैध खनन गतिविधियाँ न हों।
इस संदर्भ में राज्य गृह विभाग और डीजीपी असम द्वारा हलफनामा दाखिल करना आवश्यक समझा गया। न्यायालय ने यह भी कहा कि करीब 22 महीने बीत जाने के बाद भी उक्त दोनों अधिकारियों द्वारा हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। इसलिए न्यायालय के पास हलफनामा दाखिल करने के न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
इसलिए, न्यायालय ने आदेश जारी किया कि असम सरकार के प्रधान सचिव, गृह और राजनीतिक विभाग (या विभाग के प्रमुख), और असम के पुलिस महानिदेशक, 14 फरवरी, 2025 को अगली सुनवाई की तारीख को सुबह 10.30 बजे व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होंगे, साथ ही संबंधित पुलिस स्टेशन के सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड भी लेकर आएँगे, जिसके क्षेत्र में इस तरह के अवैध कोयला खनन कार्यों का आरोप लगाया जा रहा है। साथ ही, यदि पहले के निर्देशानुसार एक हलफनामा एक दिन पहले, 13 फरवरी, 2025 को दायर किया जाता है, तो व्यक्तिगत उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होगी।
इसके अलावा, आदेश में कहा गया है कि हलफनामे में इस जनहित याचिका के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में सभी अवैध खनन गतिविधियों को बंद करने के लिए उठाए गए कदमों का संकेत दिया जाना चाहिए और इस आदेश में पहले भी इसका उल्लेख किया गया है।
न्यायालय ने कहा कि, आमतौर पर, शीर्ष पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों को न्यायालय के समक्ष नहीं बुलाया जाना चाहिए। हालाँकि, एकमात्र विकल्प दोषी अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करना होगा।
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