नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को समलैंगिक पुरुषों, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और यौनकर्मियों द्वारा रक्तदान को रोकने वाले नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने केंद्र, राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद (एनबीटीसी), राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) से जवाब मांगा और उन्हें अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
11 अक्टूबर, 2017 को, एनबीटीसी और केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के एनएसीओ ने रक्तदाता चयन और रक्तदाता रेफरल पर दिशा-निर्देश अधिसूचित किए और ये दिशा-निर्देश ट्रांसजेंडर, महिला यौनकर्मियों और एलजीबीटीक्यूआई व्यक्तियों को रक्तदान करने से स्थायी रूप से रोकते हैं।
शीर्ष अदालत शरीफ डी रंगनेकर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 2017 के रक्तदाता नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
रंगनेकर ने कहा कि दिशा-निर्देश 1980 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में समलैंगिक पुरुषों के संबंध में लिए गए अत्यधिक पूर्वाग्रही और अनुमानित दृष्टिकोण पर आधारित हैं। याचिका में कहा गया है कि तब से, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल और कनाडा सहित कई देशों ने अपने विचारों पर पुनर्विचार किया है।
याचिका में कहा गया है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, रक्तदान पर इस तरह का कठोर प्रतिबंध इस धारणा पर आधारित है कि लोगों का एक विशेष समूह यौन संचारित रोगों (एसटीडी) से पीड़ित हो सकता है।
इस मुद्दे पर उचित आदेश पारित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध करते हुए, रंगनेकर ने कहा, "इस तरह का कठोर प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 के तहत संरक्षित समानता, सम्मान और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। इस तरह के दिशा-निर्देश सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को समाज में रहने की पूर्ण सदस्यता नहीं देते हैं और इस तरह, उन्हें दूसरे दर्जे की नागरिकता में बदल देते हैं।" इसमें केंद्र को समलैंगिक और एलजीबीटीक्यूआई व्यक्तियों को रक्तदान करने की अनुमति देने वाले दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है, जिसमें “स्क्रीन और डिफर या आकलन और परीक्षण” नीतियों के आधार पर उचित प्रतिबंध शामिल हों। (एएनआई)