

स्टाफ रिपोर्टर
गुवाहाटी: ऐसे समय में जब लोग ‘स्मार्ट मीटर’ के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं, अखिल असम विद्युत उपभोक्ता संघ द्वारा आयोजित पूर्वी क्षेत्र विद्युत उपभोक्ता सम्मेलन में सोमवार को स्मार्ट मीटर लगाने के बारे में कुछ प्रासंगिक सवाल उठाए गए।
इस बैठक की अध्यक्षता अखिल भारतीय विद्युत उपभोक्ता संघ के अध्यक्ष स्वप्न घोष ने की। असम के अलावा बिहार, ओडिशा, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और मेघालय के प्रतिनिधि मौजूद थे और उन्होंने स्मार्ट मीटर के खिलाफ़ भाषण दिए।
सम्मेलन में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि बिजली एक ज़रूरी उपयोगिता है। इस सुविधा का लाभ उठाना आम लोगों का मौलिक अधिकार है, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
"यह सम्मेलन इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है कि वर्तमान में बिजली क्षेत्र निजीकरण के गंभीर खतरे में है, जिससे आम उपभोक्ताओं को भारी परेशानी हो रही है। यह सम्मेलन गहरी पीड़ा के साथ व्यक्त करता है कि कॉर्पोरेट क्षेत्रों के हित के लिए बिजली क्षेत्र का निजीकरण करने के लिए सभी कदम उठाए गए हैं," यह कहा गया।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि प्रीपेड स्मार्ट मीटर की स्थापना के माध्यम से वितरण प्रणाली का निजीकरण करने के लिए पुनर्विकसित वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) शुरू की गई थी। "यह सम्मेलन इस बात पर ध्यान देने में विफल नहीं हो सकता है कि इस प्रयास ने पूरे देश में आम उपभोक्ताओं के बीच गंभीर असंतोष पैदा किया है। लेकिन कई राज्यों के उपभोक्ताओं के कड़े प्रतिरोध के सामने, वहाँ की सरकारों को पहले ही अपना फैसला स्थगित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है," यह कहा गया।
अन्य लोगों ने कुछ प्रासंगिक प्रश्न उठाए, जैसे (क) क्या मौजूदा डिजिटल मीटर उपभोक्ताओं की बिजली की सही खपत को मापने में असमर्थ है? और (ख) क्या यह वैज्ञानिक प्रयोग के माध्यम से अप्रचलित साबित हुआ है?
उन्होंने कहा कि इसका उत्तर 'नहीं' है। फिर यह कदम क्यों उठाया गया? उन्होंने सवाल किया।
सम्मेलन ने कहा कि बिजली एक आवश्यक उपयोगिता है, और स्वतंत्रता के बाद, 1948 का विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम बिना किसी हानि, बिना किसी लाभ के आधार पर बिजली की आपूर्ति करने के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन सरकारी खजाने की कीमत पर राष्ट्रव्यापी ग्रिड नेटवर्क के गठन के बाद, केंद्र सरकार ने लोगों के हितों के खिलाफ विद्युत अधिनियम 2003 बनाया, वक्ताओं ने दावा किया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ निजी बिजली उत्पादक सत्ताधारियों के प्रत्यक्ष संरक्षण में अनुचित बिजली खरीद समझौते के माध्यम से राज्य के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों को उच्च दर पर बिजली खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं को अनगिनत कष्ट हो रहे हैं।
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