

कोच्चि: केरला उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि एक बलात्कार पीड़िता को उस आदमी के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिसने उसके साथ बलात्कार किया था।
“मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट की धारा 3(2) में प्रावधान है कि यदि गर्भावस्था जारी रहने से गर्भवती महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान होगा, तो गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है।
“धारा 3 (2) के स्पष्टीकरण 2 में कहा गया है कि जहां गर्भावस्था बलात्कार के कारण हुई थी, गर्भावस्था के कारण होने वाली पीड़ा को गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर चोट माना जाएगा। इसलिए, किसी बलात्कार पीड़िता को उस पुरुष के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिसने उसका यौन उत्पीड़न किया।
“बलात्कार पीड़िता को उसकी अवांछित गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार करना उस पर मातृत्व की ज़िम्मेदारी थोपने और सम्मान के साथ जीने के उसके मानव अधिकार से इनकार करने जैसा होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। , “उच्च न्यायालय ने कहा।
उच्च न्यायालय ने आगे बताया कि “ज्यादातर मामलों में शादी के बाहर गर्भावस्था हानिकारक होती है, खासकर यौन शोषण के बाद और यह गर्भवती महिला, पीड़ित के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करने वाले आघात का कारण है। किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार अपने आप में कष्टकारी होता है और इसके परिणामस्वरूप गर्भधारण से चोट और बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसी गर्भावस्था स्वैच्छिक या सचेतन गर्भावस्था नहीं है।”
अदालत ने यह निर्देश 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता द्वारा अपनी मां के माध्यम से दायर याचिका पर दिया। आरोप था कि जब लड़की 9वीं कक्षा में पढ़ती थी, तब उसके 19 वर्षीय "प्रेमी" ने उसका यौन शोषण किया और वह गर्भवती हो गई।
चूंकि एमटीपी अधिनियम केवल 24वें सप्ताह (कुछ परिस्थितियों को छोड़कर) तक गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देता है, इसलिए मां और नाबालिग लड़की ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपनी 28 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति मांगी।
अदालत ने बताया कि, "प्रजनन अधिकारों में यह चुनने का अधिकार शामिल है कि बच्चे पैदा करने हैं या नहीं और कब, बच्चों की संख्या चुनने का अधिकार और सुरक्षित और कानूनी गर्भपात तक पहुंच का अधिकार।"
अदालत ने गर्भवती लड़की की जांच के लिए गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट देखी, जिसका मानना था कि गर्भावस्था जारी रखना उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
इस पर ध्यान देने के बाद, अदालत ने उसे गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि प्रक्रिया के बाद भ्रूण जीवित पाया जाता है, तो अस्पताल को इसकी देखभाल करनी होगी और राज्य को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बच्चे को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के अलावा जिम्मेदारी लेने का निर्देश दिया। (आईएएनएस)
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