

नई दिल्ली: जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई 8 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दी। सोनम वांगचुक ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत उनकी हिरासत को अवैध, मनमाना और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी है।
केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा वांगचुक की पत्नी द्वारा दायर प्रत्युत्तर पर जवाब देने के लिए और समय माँगे जाने के बाद न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने कार्यवाही स्थगित कर दी।
शीर्ष अदालत ने 29 अक्टूबर को उनकी संशोधित याचिका पर केंद्र और लद्दाख प्रशासन से जवाब माँगा था। संशोधित याचिका में तर्क दिया गया था कि हिरासत आदेश पुरानी प्राथमिकियों और अस्पष्ट व काल्पनिक आरोपों पर आधारित था, जिनका इस तरह के कड़े कानून को उचित ठहराने के लिए कोई 'सजीव या निकट संबंध' नहीं था। इसमें कहा गया था कि यह आदेश निवारक निरोध की शक्तियों का घोर दुरुपयोग है और संवैधानिक स्वतंत्रता के मूल पर प्रहार करता है।
याचिकाकर्ता ने इसे 'पूरी तरह से बेतुका' बताया कि तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से ज़मीनी स्तर पर शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपने काम के लिए प्रशंसित वांगचुक को अचानक ख़तरा समझा जाएगा।
इसके अलावा, उनकी पत्नी ने यह भी कहा कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा, जिसमें चार लोग मारे गए और 90 घायल हुए, के लिए वांगचुक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कार्यकर्ता ने ख़ुद सोशल मीडिया पर इस हिंसा की निंदा करते हुए इसे 'अपने जीवन का सबसे दुखद दिन' बताया और आगाह किया कि इस तरह की हरकतें लद्दाख की शांतिपूर्ण 'तपस्या' को पटरी से उतार देंगी।
वांगचुक को 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने उन पर लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा दिए जाने के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान अशांति भड़काने का आरोप लगाया था। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत, किसी व्यक्ति को 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है, जब तक कि आदेश को पहले ही रद्द न कर दिया जाए।